Sunday, July 9, 2017

क्या IPC का दूसरा रूप GST है ?

       क्या IPC का दूसरा रूप GST है ?


  अदालत एक ऐसी जगह है जहां हर कोई जाने से डरता है। एक बार आप अदालत के फंदे में फंस गए तो फिर गणेश परिक्रमा करते करते शायद ज़िंदगी गुजर जाये। जीएसटी के मामले में भी कुछ ऐसा ही नज़र आ रहा है। अदालत के दांव- पेंच में माहिर अरुण जेटली की पोटली से जैसे जैसे जीएसटी लिहाफ से बाहर निकल रहा है तो इसे समझने के बाद ऐसा लगता है कि इसे आईपीसी की लाठी से हांक दिया है। अंतर इतना है कि आईपीसी की व्याख्या करने के लिए काले कोट वाले मिल जायेंगे, लोकिन जीएसटी को समझने के लिए अभी तो सीए भी नहीं समझ पा रहे। तो फिर क्या जीएसटी भी आईपीसी की तर्ज पर नुकीले पेंच से फंसा हुआ है ?  जिस आईपीसी को जज और वकील अपने अनुसार उसको निचोड़ कर फैसला सुनाते हैं, कुछ ऐसा ही जीएसटी को निचोड़ने पर एक देश एक टैक्स के बजाय एक देश में अनगिनत टैक्स धरातल पर उतर रहे हैं। यानी कि 13 साल की घनघोर तपस्या के बाद जीएसटी का जो खाका मोदी सरकार ने खींचा है वो किसी इंडियन पीनल कोड की धारा से कम नहीं है। तो फिर क्या जीएसटी को समझने के लिए आईपीसी पढ़ना जरूरी है। क्योंकि प्रथम दृष्ट्या तो यही मालूम पड़ रहा है कि जीएसटी के निर्माता आईपीसी के माहिर खिलाड़ी है। ऐसे में अगर जीएसटी भी आईपीसी की छौंक-बघार से बना है तो फिर यह केवल चुनिंदा लोगों के हाथ में रह जायेगा। जीएसटी अन्य देशों की अपेक्षा भारत का जीएसटी किसी जलेबी से कम नहीं है। जिन देशों से जीएसटी की परिभाषा उधार ली गई है, इतना उलझा हुआ तो उन देशों ने भी नहीं बनाया तो फिर सवाल ये उठता है कि भारत के नौकरशाहों ने सफेदपोश के चक्कर में फंसकर घुंघराला जीएसटी किस आधार पर पैदा कर दिया। जिन देशों में जीएसटी लागू है, उनमें रूस में सबसे अधिक 18 फीसदी फिर चीन में 17 फीसदी है।  मैक्सिको में 16 फीसदी, न्यूजीलैंड, मॉरिसस और कनाड़ा में 15 फीसदी,  दक्षिण अफ्रीका में 14 फिलीपींस में 12 फीसदी है। जबकि सिंगापुर जहां से जीएसटी को उधार लिया गया है वहां सात फीसदी है। वहीं कुवैत, यूएई, बहरीन, में सबसे कम 5 फीसदी है।   

      तो फिर अब सवाल यह उठता है कि आखिर किस वर्ग को खुश करने के लिए इतना घुमावदार जीएसटी बनाया गया है? इस लच्छेदार जीएसटी से एक बात तो तय है कि छोटे और मझोले व्यापारियों के लिए व्यापार करना अब आसान नहीं रह जायेगा। जीएसटी का स्लैब भी किसी गगनचुंबी इमारत की स्लैब से कम नहीं है। जीएसटी का स्लैब ज़ीरो फीसदी, 3, 5, 12, 18 और 28 फीसदी का है। इस स्लैब के अलावा भूल चूक लेन-देन भी माफ नहीं है। यानी सावधानी हटी, कारावास की दीवार से कब सट गए पता ही नहीं चलेगा। छोटे स्तर के व्यापारी और मझोले किस्म के उद्योग धंधों पर खतरों के बादल मंडराने लगे हैं। आम व्यापारी जब तक इस मकजड़जाल को समझेगा। तब तक उद्योग जगत को बहुत हानि हो चुकी होगी। जीरो फीसदी नाम का एक अलग से स्लैब तैयार किया गया है। यही ज़ीरो फीसदी 2019 के बाद काल के गाल में जाने के लिए तैयार करेगा। दरअसल रोजमर्रा की चीजों को जीरो फीसदी टैक्स पर रखा गया है, यानी कि अभी तो उसमें टैक्स नहीं लगेगा, लेकिन भविष्य में चुपके से कब जीरो से कुछ पर्सेंट बढ़ा दिया जायेगा, ये किसी को भी पता नहीं चलेगा। यहां एक देश एक टैक्स के नाम पर कई तरह के टैक्स, सेस लगाए गए हैं, जिसमें व्यापारी वर्ग को हर प्रदेश के अनुसार रिटर्न फाइल करना होगा। छोटे और मझोले व्यापारी स्थाई रूप से सीए या एकाउंटेंट नहीं रखते, लेकिन अब उन्हें इन दोनों पदों पर हमेशा के लिए नियुक्त करना पड़ेगा। तो फिर क्या मोदी सरकार ने जो करोड़ों जॉब देने का वादा किया था, वो जीएसटी के जरिए पूरा किया जायेगा। यदि जीएसटी के जरिए रोजगार की खोज की जा रही हो, तो फिर सवाल ये उठता है कि कितने व्यापारी बचेंगे जो जीएसटी को देने लायक बचेंगे। ऐसे में यदि जीएसटी ही व्यापारी वर्ग को तबाह करने का औजार बन रहा हो तो फिर मोदी सरकार का कहना है कि उसके रगों में व्यापारी का खून बहता है, तो फिर यह कौन सा खून है जिससे व्यापारी सहमें हुए हैं। क्या विश्व व्यापार संगठन के आंतरिक दबाव की वजह से इतना पेचीदा जीएसटी बनाया गया है या फिर नौकरशाह ही खुद न समझ पा रहे हों कि जीएसटी की स्लैब की इमारत कैसे खड़ी की जाती है ?  अभी जीएसटी के सिस्टम को समझने के लिए बैंकिग सेक्टर पूरी तरीके से तैयार नहीं है। इस नए जीएसटी से बैंकिंग सेक्टर के ऊपर जो दबाव बढ़ेगा, वो अलग है। कुल मिलाकर जीएसटी को जितना जलेबी की तरह मीठा बताया जा रहा है, वैसा है नहीं, बल्कि टेढ़ा जरूर है। यह जीएसटी किसी आईपीसी की धारा से कम नहीं है। यानी भारतीय दंड संविदा और वस्तु एवं सेवा दर क्या एक समान हो गए। भारतीय दंड संविदा को तो सभी जानते है, लेकिन नतीजे क्या होगें ये किसी को पता नहीं रहता। तो फिर नतीजों का इस्तेमाल करने लिए क्या जीएसटी ही दूसरा आईपीसी बनकर साबित होगा। 

Monday, June 12, 2017

पाक बर्बादी की कगार पर....


पाक बर्बादी की कगार पर....

काश्मीर को पाने की "लालसा" पाकिस्तान का कहीं "अस्तित्व" ही ना खत्म कर दे। और यह काम भारत नहीं करेगा , बल्कि उसका परम हितैषी "मित्र" चीन करेगा। अब आपके मन में सवाल पैदा होगा.....................

आखिर क्यों? कैसे? और कब करेगा

तो पहले "क्यों" का जवाब है , ये "वजह" ...पाकिस्तान का भारत के प्रति जुनून के हद तक "नफरत" और काश्मीर नाम का "रक्त" जो उसकी शिराओं में बह रहा है ।
 मैंने अपनी पिछली पोस्ट में लिखा था कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व के रहने तक वह काश्मीर को नहीं भूलेगा ...तो इसे पाने के लिए वह चीन की मदद ले रहा है जो भारत का भी शत्रु है। 
 चीन भी पाकिस्तान के इस "बीमार" मानसिकता को भलीभाँति समझ चुका है ,... यानी उसकी कमजोर नब्ज को पकड़ लिया है। आप जानते हैं कि चीन एक महाशक्ति बन चुका है । चीन की विस्तार वादी नीति अपने देश की सीमा को हर वक्त बढ़ते हुए देखना चाहती है। चीन जहाँ एक तरफ भारत के पूर्वोत्तर इलाकों पर गीद्ध की तरह निगाहें रखता है .. वहीं वो सालों पहले काश्मीर का हिस्सा (अक्साइचीन) हड़प लिया ....जबकि पाकिस्तान ने भी अपने कब्जे वाले हिस्से का कुछ भाग चीन को दान कर दिया। 

 अब उसकी निगाह पूरे पाकिस्तान को "हड़पने" पर लगी हुई है।............अब देखिए कि चीन कर क्या रहा है?....
यह तो सर्वविदित है कि पाकिस्तान के उपर आतंकवादी देश होने का "लेबल" चिपक गया है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उसे शक की निगाह से देखता है । वहाँ के शासन का बागडोर किसके हाथ में है कुछ पता नहीं चलता। चुनी हुई सरकार , सेना एवं आई एस आई ये तीनों ही अपने-अपने हिसाब से देश को चला रही हैं। अर्थव्यवस्था चौपट है...विदेशी खैरात पर इकोनोमी टीकी हुई है....रक्षा बजट पर खर्च भी भारत से ज्यादा खर्च करना है , तो...ऐसे में वो चीन का दामन थाम चुका है । चीन का विदेशी मुद्रा भंडार भरा पड़ा है..वहीं पाकिस्तान का खाली है। तो अब चीन अपने ड्रेगन के पेट में यूआन और डालर भर भर कर पाकिस्तान के उपर अपने विशाल मुँह से बारिश कर रहा है। 

ठीक यही काम उसने सालों पहले उत्तर कोरिया के साथ भी किया था। क्या हुआ उसका हाल ??....बरबाद कर दिया चीन ने उसे । जरा सोचें....जब कोरिया दो हिस्से में बँटा था साउथ एवं नार्थ कोरिया में ......तो दोनों नवनिर्मित देश क्षेत्रफल एवं संसाधनों की दृष्टि से एक समान थे। आज साउथ कोरिया का जीडीपी 46000 अरब रुपए का है वहीं नार्थ कोरिया का मात्र 1650 अरब रुपए का । ये चीन की दोस्ती का नतीजा है। बाकी का कसर किम जोंग के बाप ने एवं अब वो खुद पूरा कर रहा है। ....एक दिन यही चीन का ड्रेगन पूरे पाकिस्तान को निगल जाएगा।

 अब देखिए चीन एक ऐसी महाशक्ति बन चुका है कि वो अमेरिका को भी आँखें दिखा सकता है। साउथ चाइना सी में अपनी धमक दिखा चुका है......अब वो अरब सागर एवं हिन्द महासागर में भी दिखाना चाहता है। पाकिस्तान के बलुचीस्तान के ग्वादर में एक पोर्ट बना रहा है। अपने देश के शिनजियांग से ग्वादर पोर्ट तक वह एक इकोनोमिक कारीडोर बना रहा है। इसकी सुरक्षा के लिए वो एक विशेष सुरक्षा बल तैनात किया है। पीओके में इकोनोमीक जोन बना रहा है अपनी इंडस्ट्रीज लगा रहा है , ..वहाँ भी अपने तीन हजार सैनिकों की तैनाती किया है। .........फिर, गिलगीट-बल्तिस्तान में भी कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं जिनमें बाँध , बिजली परियोजनाएँ शामिल हैं...उनकी सुरक्षा में भी अपने हजारों सैनिकों की तैनाती किया है। कराँची मे दो परमाणु रिएक्टर लगा रहा है , जो कितना सुरक्षित या असुरक्षित है अभी उसे भी नहीं पता है ...तो उसकी सुरक्षा के लिए भी सैकड़ों सैनिकों को लगाया है।
 अपनी सारी योजनाओं को निर्बाध रूप से पूरा करने के लिए वो वहाँ के धार्मिक उन्मादी ग्रूपों से गठजोड़ कर लिया है। इसका नजारा अभी हाल में ही दिखा जब मुंबई हमले के मास्टर माइंड अजहर मसूद को क्लीन चीट देकर अपनी मंशा जता दिया है , जिसका विरोध भी भारत कर चुका है ।

पाकिस्तान अपने आप को "सरेंडर" कर चुका है। चीन धीरे धीरे उसके परमाणु प्रतिष्ठान को अपने कब्जे में ले लेगा। बाद में वहाँ की राजनीति को भी हैंडल करने लगेगा....उसे पंगु बना देगा , पाकिस्तान उसके इशारे पर नाचेगा । पाकिस्तान की अपनी ताकत कुछ भी नहीं बचेगी क्योंकि तबतक चीन अपनी पूरी पैठ बना चुका होगा। ग्वादर पोर्ट में नौ सैनिक अड्डा बनाने की भी तैयारी कर दिया है । अमेरिका, चीन की किसी भी गतिविधियों का विरोध नहीं कर सकता क्योंकि चीन चाहे तो उसकी इकोनोमी को हिला सकता है। अतः अमेरिका उसके रास्ते से हट जाएगा। 
 कुछ सालों तक पाकिस्तान , चीन का एक "उपनिवेश" बना रहेगा ...बाद में चीन का नक्शा बदला जाएगा और पाकिस्तान विश्व के नक्शे से खत्म हो जाएगा । अब तक चीन का ड्रेगन पाकिस्तान को अपने पेट में निगल चुका होगा। आपके सामने उदाहरण ईस्ट इंडिया कंपनी का है। 

चीन का पूरे एशिया पर दबदबा होगा। 
 पर भारत पर उसका आंशिक असर ही पड़ेगा। उसकी वजह है भारत की तेज गति से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था । चीन की अर्थव्यवस्था अब गिरने लगी है और भारत की बढ़ने लगी है। चीन को रोकने के लिए अमेरिका हर हाल में भारत को मजबूत बनाएगा। अभी हाल के दिनों में आपने देखा ही होगा कि कैसे भारत के प्रधानमंत्री विदेशों का दौरा करके अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को अपने पक्ष में करने लगे हैं ...एवं अमेरिकी संसद में बजने वाली तालियाँ इस बात की गवाही दे रही है। 

एशिया में चीन के टक्कर का देश सिर्फ भारत होगा। 

पाकिस्तान तो "गायब" हो ही चुका होगा। 

पर ऐसा क्यों हुआ?? तो वजह है काश्मीर ....वजह है भारत के प्रति पाकिस्तान का नफरत । 
 तो देखा आपने...पाकिस्तान का ये हश्र कराने वाला यही काश्मीर ही होगा। 
 पर क्या ये बातें पाकिस्तान नहीं जानता है ?
तो उत्तर है ...वो भी जानता है पर उसकी रगों में "काश्मीर" नाम का खून दौड़ रहा है। हाफ़िज़ सईद ने भी कहा है कि हम अपनी बर्बादी तक काश्मीर का पीछा नहीं छोड़ेंगे....

तो बहुत अच्छी बात है...वो बर्बादी अब ज्यादा दूर नहीं है...........।


Thursday, April 27, 2017

राम, रावण बनाम मोदी की राजनीतिक चाल


राम और रावण भी अपने समय के प्रबुद्ध राजनीतिकार थे। उन्होंने भी अपनी राजनीति की बदौलत ही वंश, या प्रजा की रक्षा हेतु काम किये। यानी रामायण में वो सभी आयाम हैं, जो एक स्वस्थ्य समाज के लिए शासन करना, समाज का निर्धारण करना, असुर शक्तियों से निपटना यह सब कुछ निहित है। अब इस  आलेख में राम, रावण और मोदी की राजनीतिक चाल का विश्लेषण करके यह बताने का प्रयास करुंगा कि राजनीति होती क्या है ? क्या है नीति! और क्या है राज ?  
तो सबसे पहले भगवान श्री राम के राजनीतिक जीवन पर चर्चा ---

मर्यादा पुरुषोत्तम राम ---  भगवार राम को कई नामों से पुकारा गया है, वो भगवान तो थे ही, लेकिन एक कुशल राजनीतिक भी थे। राम के राजनीतिक जीवन को समझने के लिए सीता परित्याग और अश्वमेध यज्ञ नामक दो घटनाएं राजनीतिक जीवन को समझने के लिए पर्याप्त हैं। कहते हैं लंका जीतकर जब राम वापस अयोध्या आये तो कुछ समय बाद राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि माता सीता को वापस वन में भेज दो। लक्ष्मण ने मना कर दिया, तो भगवान राम ने लक्ष्मण को राज धर्म का आदेश याद दिलाया और इसे अनिवार्य बताया। सवाल यह है कि आखिर राम ने सीता को वन में क्यों भेजा, अब यहां पर समझने की बारी है। माता सीता जब वन में गई और लक्ष्मण ने कहा कि अब हम तुमको यहीं पर छोड़कर जा रहे हैं तो माता सीता रोने लगी और नदी में अपनी जीवन लीला समाप्त करने के बारे में सोच-विचार कर रही थी, तभी उनकी नजर महर्षि बाल्मीकि पर पड़ गई और बाल्मीकि के आश्रम में सीता रहने लगी। जहां पहले से ही कई देवियां वास करती थी। बाल्मीकि पशोपेश में फंस गए कि रामायण में अभी और क्या लिखना शेष है ? सीता को वापस वन भेजने में राम का क्या उद्देश्य है ? वो इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे कि तभी पता चला कि सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया । बाल्मीकि प्रसन्न हुए और बच्चों का नामकरण लव और कुश में किया। वो लगे बच्चों को शिक्षा-दीक्षा देने में। बच्चों को शस्त्रभ्यास करते हुए 11 साल गुजर गये थे। दोनो लड़के शिक्षा-दीक्षा में निपुण हो गये थे । उसी समय भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बाल्मीकि के आश्रम में आया। लड़कों ने देखा कि अश्व के गले में एक संदेश लिखा है, पढ़ने पर ज्ञात हुआ कि इस अश्व को जो पकड़ेगा या बांधेगा उसे युद्ध करना पड़ेगा। लव और कुश इसी फिराक में थे, कि इतने साल से सीख रहे हैं, आखिर विद्या कब काम आयेगी। शत्रुघ्न ने युद्ध न करने के लिए लड़कों को समझाया, लेकिन आखिर लड़के कहां मानने वाले थे  युद्ध शुरु हुआ, लक्ष्मण मूर्छित हो गए। क्रमश: सुग्रीव, विभीषण भी लव कुश से पराजित हो गये। आयोध्या से लक्ष्मण आये युद्ध के लिए। लक्ष्मण भी पराजित हो गये। यह दृश्य हनुमान भी देख रहे थे, तभी हनुमान ने ध्यान किया। ध्यान में उन्हें पता चला कि भगवान राम के ये दोनो लड़के हैं। आखिर में भगवान राम स्वयं आये और लड़कों से अश्व को छोड़ने के लिए कहा। लड़कों ने कह दिया युद्ध करो। भगवान राम अपने धनुष बाण चढ़ाये ही थे कि महर्षि बाल्मिकी प्रकट हो गये और राम को कहा कि रामबच्चों से मचलना आपको शोभा नहीं देता। माना कि राज हठ होता है, किंतु उससे बाल हठ टकराये तो राज हठ को पीछे हट जाना चाहिए। राम ने बाल्मीकि की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए अपने कदम वापस खीच लिये। महर्षि के कहने पर बालकों ने अश्व को मुक्त कर दिया। तब लव ने भगवान राम से एक प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी। राम ने कहा पूछो। लव ने कहा – जिस सीता ने स्वर्णिम लंका को तिनके के समान समझा, चक्रवर्ती सम्राट राजसी ऐश्वर्य को तिलांजलि दी। कांटों के पथ पर नंगे पांव छाया की तरह आपकी अनुगामिनी रही, अग्नि परीक्षता सीता का परित्याग क्यों किया ?   उनका अपराध क्या था ?
राम ने समझाया – बच्चों! वह थी राजनीति!  राजनीति के सूत्र अत्यंत सूक्ष्म होते हैं। जिन्हें बड़े होने पर तुम समझोगे। सीता परित्याग के माध्यम से उन्होंने महर्षि के दिव्यास्त्रों को प्राप्त कर लिया। चक्रवर्ती सम्राट उन शस्त्रों की भिक्षा तो मांग नहीं सकता था। वो दिव्य शास्त्र ऋषि के लिए भार स्वरूप हो चुके थे। अनावश्यक रूप से भजन छोड़कर उधर ही ध्यान दिया करते थे कि कोई उनका दुरुपयोग न कर दे। वे सारे दिव्य शास्त्र उन्हें मिल गये। बच्चों के पालन-पोषण के लिए मां से श्रेष्ठ संरक्षिका विधाता की सृष्टि में कोई आज तक है ही नहीं। उन्होंने सोचा, सिंहासन की अपेक्षा वन में बच्चों की देख-रेख करना सीता के लिए अधिक श्रेयस्कर है। देखरेख सीता से हो रही थी और विद्या अध्ययन गुरुदेव से। यह थी राम की सूक्ष्म राजनीति। परित्याग तो उन्होंने सीता का किया ही नहीं।

रावण की राजनीतिक चाल – राम रावण के युद्ध के बाद जब राम ने लक्ष्मण को रावण के पास राजनीति के गुर सीखने के लिए भेजा तो पहली बार लक्ष्ण को कुछ नहीं मिला, क्योंकि राम लक्ष्मण रावण के सिर के पास खड़े थे, वापस आ गये। राम ने रावण के चरणों के पास खड़े होने के लिए कहा – जब लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में रावण के चरणों के पास खड़े हुए तो रावण के शरीर में अचानक बिजली दौड़ गई और लक्ष्मण पर झपटकर कहा कि तुम अगर राम के अनुज न होते तो मैं तुम्हें मार देता। इसलिए  राजनीति की पहली शिक्षा यह है कि शत्रु चाहे मरणासन्न हो या मर ही क्यों न गया हो जब भी जाओ तो सावधान मुद्रा में ही जाओ। लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा – उपदेश तो बहुत अच्छा कर लेते हो, किंतु नीति का पालन आपसे नहीं हो सका। एक स्त्री के व्यामोह में अपने वंश का नाश करवा डाला। रावण ने समाधान करते हुए कहा – नहीं लक्ष्मण ! यह तुम्हारी भूल है। वंश की रक्षा के लिए ही मैने विभीषण को राम की शरण में जाने के लिए विवश कर दिया था। लक्ष्मण ने कहा – क्या लातों से मारकर भेजने का अच्छा तरीका था ? रावण ने कहा – नहीं लक्ष्मण ! यदि मैं प्रेम से भेजता तब यह रहस्य कुछ लोग जान जाते। मेरा अभीष्ट पूर्ण न होता। राजनीति का नियम है कि योजना किसी पर भी प्रकट न हो। वह न समझ में आये और उसके द्वारा जो सिद्ध होने वाला कार्य है वह सामने दिखाई पड़े। इसलिए मैंने विभीषण को प्रताड़ित कर निष्कासित किया। मैं उसे बंदी गृह में भी तो डाल सकता था। लक्ष्मण ने कहा- चलिए मान भी लेते हैं कि वंश की सुरक्षा के लिए आपने अपनी योजना के अनुसार ही भेजा था। तो कल विभीषण पर मरणान्तक शक्ति का प्रहार क्यों किया ? रावण ने कहा – लक्ष्मण ! मुझे संदेह था कि राम मेरे वंश की रक्षा कर पायेंगे या नहीं, इसी की परीक्षा के लिए मैंने शक्ति का प्रहार किया। राम जी ने अपने वक्षस्थल पर उस शक्ति को झेल लिया। इससे मैं आश्वस्त हो गया कि अब मेरा वंश सुरक्षित है। लक्ष्मण ! मेरे द्वारा पहले किये गये युद्ध शक्ति प्रहार के पश्चात किये गये युद्ध कौशल में अंतर तो तुमने देखा ही होगा। लक्ष्मण ने कहा – हां राजन! शक्ति प्रहार के पश्चात का संग्राम देखकर संदेह होने लगा था कि कभी भी आप मरेंगे ही नहीं। रावण ने कहा – यही उसका कारण था कि मेरा वंश सुरक्षित हो गया। इसलिए जितने भी दिव्य शास्त्र मैने छिपा रखे थे, सभी मैने उड़ेल दिये। मैं जानता था कि रामजी का तो कुछ बिगड़ने वाला है नहीं है। व्यर्थ ही इतने अस्त्र-शस्त्र का संग्रह क्या करना है ? कम से कम लोग यह भी तो देख लें कि रावण कितना पराक्रमी है। दिव्यास्त्रों का ज्ञाता है। राम से युद्ध का निर्णय तो मैंने शूर्पणखा की सूचना से ही कर लिया था। रावण राम को भगवान न मानने का अभिनय करता था। रावण आगे कहता है कि – हे लक्ष्मण ! लंका के सभी निवासी मेरा अनुसरण करते थे। हमने पाप किया और सबसे कराया। मैंने सोचा – क्यों न प्रभु के धाम का मार्ग सबको सुलभ करा दूं। इसलिए पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इत्यादि सभी को मैंने राम के बाणों के समक्ष धकेल दिया। मैं ज्योतिष का भी आचार्य हूं। मुझे ज्ञात था कि आयु के कितने दिन शेष है ? जाना तो पड़ेगा ही। स्वर्णिम लंका कब तक हमारी रहेगी ? इसको तो छूटना ही था। प्रश्न था कि भगवान के धाम जाऊं या नरक में ? धाम के लिए हमने मार्ग प्रशस्त कर लिया। लक्ष्मण ! तुम धाम जाओगे तो वहां मैं तुमसे मिलूंगा। यह राजनीति थी लक्ष्मण। न हमने विभीषण का अपमान किया न माता जी का अपहरण, हमें तो अपने लक्ष्य की सिद्धी करनी थी। लक्ष्मण ने लौटकर राम को वृतांत सुनाया और कहा भैया ! वह तो महान राजनीतिज्ञ है। उसने तो माता सीता का हरण किया ही नहीं। उसने तो अपना लक्ष्य पूर्ण कर लिया। भगवान इस रहस्य को जानते थे। उन्हें संदेहयुक्त अपने ऐसे सेवकों का भी उद्धार करना ही था।

मोदी की राजनीति --- मोदी की राजनीति हो या किसी की भी, सभी अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिए ही राजनीति करते हैं। राजनीति के लिए कम से कम 20 साल पहले योजना बनाकर चलना पड़ता है। मोदी भी इस फार्मूले को अपनाने में पीछे नहीं है। वर्तमान में मोदी के राजनीतिक कदम कब आगे-पीछे किस दिशा में बढ़ जाते हैं किसी को कानों कान खबर तक नहीं पहुंचती। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले मोदी लव लेटर लिखना बंद करो की आवाज़ बुलंद कर रहे थे, लेकिन शपथ ग्रहण समारोह में लव लेटर वालों को न्योता दे दिया। इतना ही नहीं गोपनीय तरीके से पाकिस्तान जाकर उपहार भी दे आये। इसके बाद जो फैसले हुए वो कभी किसी को पता ही नहीं चला। नोटबंदी हो, विदेश यात्रा, योगी को मुख्यमंत्री बनाना, ये सभी फैसले सुनते ही लोग चौंक गये। लेकिन मोदी अपनी रफ्तार से ही आगे बढ़ रहे हैं। उनकी आगे की क्या रणनीति है, ये किसी को नहीं पता। गोवा में अल्पमत में होते हुए भी भाजपा ने सरकार बना ली, और उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत में होते हुए भी मुख्यमंत्री ढूंढ़ने में इतने दिन लग गये। ये सभी राजनीति के अंग हैं। इससे भी बड़ी बात ये है कि विधायकों ने अपने दल का जो नेता चुना वो भी विधायक दल से बाहर का। यानी मुख्यमंत्री और दोनो उपमुख्यमंत्री भी विधायक श्रेणी से बाहर के। तो फिर क्या मोदी को राजनीति का चाणक्य कहा जाये या फिर मोदी ही दूसरे चाणक्य है। अगर वर्तमान परिदृश्य को ही राजनीतिक चश्मे से विश्लेषण करें तो उत्तर प्रदेश विधान सभा में सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव के पहले ही एक तरीके से सरेंडर कर दिया । यानी सभी दलों ने मिलकर भाजपा को जिताने में सहायता की। सपा ने अपने घर में गृह युद्ध किया। सुना है कि इस गृह युद्ध के लिए सात समंदर पार से किसी पॉलिटिकल पॉलिसी के प्रणेता को बतौर फीस देकर युद्ध कराया गया। यानी सपा ने चुनाव के पहले ही साइकिल को पंचर कर दिया। बहन जी ने हाथी पर ऐसे महावत बैठा दिये जो हाथी को आगे बढ़ाने में असक्षम थे। तो फिर क्या घूम फिर कर सवाल यही नाच रहा है कि आखिर मोदी की ऐसी कौन सी राजनीतिक चाल रही जो माया, मुलायम, अखिलेश जान बूझकर सरेंडर करते नजर आये। परिणाम आने के पहले ही अखिलेश सिंह ने साइकिल पर हाथी की सवारी का इशारा कर दिया।

   प्यार की गलियों में आई लव यू और सियासी गलियारे में सीबीआई। ये तीन शब्द मीडिया के लिए जादुई शब्द हैं। यही तीन शब्द राजनीतिक जीवन का भविष्य तय करते हैं। आईलवयू  (नेताओं के सेक्स कांड) और सीबीआई इन शब्दों के फंदे में कई बड़े नेता फंसे हुए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या मुलायम सिंह ने स्वयं चुनाव के पहले व्यूह रचा। चाचा-भतीजे का झगड़ा, पिता-पुत्र का झगड़ा। किसी न किसी अभीष्ट फल की प्राप्ति दे रहा था। सियासी गलियारे में कुछ लोग इसे सकारात्मक पहल में ले रहे थे। कह रहे थे कि इस झगड़े से साइकिल मजबूत हई है तो फिर क्या झगड़ा भी किसी सीरियल की पटकथा की तरह लिखा गया था। साइकिल और हाथी मैदान में उतरना भी चाहते हों और कमल खिलने की दुआ भी करते हों । कुछ ऐसे ही चुनाव की शुरुआत हुई थी। सभी पार्टियों ने खूब प्रचार-प्रसार किया। लेकिन मोदी के आगे सब नतमस्तक हो गये। मोदी जिधर गये। लाइन वहीं से शुरु हो गई। यदि मोदी ने भोले बाबा की पूजा की तो साइकिल और पंजे वाले भी बम बम भोले बोलने लगे। यानी हिंदुत्व के चेहरे को मुखार बिंदु पर लाने के लिए मोदी ने बिल्कुल भी नहीं सोचा कि क्या प्रभाव पड़ेगा, उल्टे धर्मनिरपेक्ष विचार धारा वाले भी हर हर बम बम और हवन यज्ञ पर आ गये। तो क्या मोदी की रणनीति भी वही है जो भगवान श्री राम ने किया कि राजनीति में योजना प्रकट न हो, लेकिन परिणान सामने होना चाहिए। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले सियासी गलियारे में कुछ ऐसी सोच थी कि वर्तमान परिदृश्य में देश की राजनीति को अगर समझना है तो देश के नजरिए से अगर इस दौर में सरकार को परिभाषित किया जाये तो पहले देश बेचना फिर देश की फिक्र करना और अब फिक्र करते हुए देश को अंगुलियों पर नचाना सरकार का राजनीतिक हुनर है। यही हुनर था राजनेताओं का। शायद यही वजह है कि जो नेता पहली बार चुनाव के पहले शपथ पत्र देते थे, दूसरी बार के चुनाव में मूसलाधार बारिश की तरह संपत्ति बढ़ती देखी गई है। यानी अपना विकास करने के मकसद से अगर देश में कुछ विकास हो जाता है तो वही विकास की श्रेणी में गिना जायेगा। लेकिन अब तो विकास की परिभाषा ही बदल गई है। और विकास देश के अंतिम छोर में खड़े नागरिक तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है और पहुंच भी रही है। उज्ज्वला योजना और शौचालय जैसी योजनाएं गांवों तक पहुंच रही हैं।

  तो फिर क्या मोदी की चाल को भी अभी भी राजनीतिक पंडित नही समझ पा रहे हैं। मोदी की रणनीति के सूत्र अत्यंत सूक्ष्म हैं, जो मीडिया या राजनीतिक दल को नहीं पता चल पाता। यानी कि त्रेतायुग की राजनीतिक चाल से लेकर अब कलियुग तक की राजनीतिक चाल का अध्ययन करें तो पायेंगे कि राजनीतिक  सूत्र पता नहीं कब एक और एक को जोड़कर दो बना देते हैं और कब भौतिकी के गेट के सूत्र की तरह 1 और 1 को जोड़ने पर 11 बना देते हैं। 

Tuesday, August 2, 2016

आ रहा है मराठी भाषा में उपन्यास बगला

आ रहा है मराठी भाषा में उपन्यास बगला

जब से तकनीकी दुनिया में डिजटाइजेशन का युग शुरु हुआ है, तब से जिंदगी और समाज का डिजटलीकरण हो गया है। टैब और स्मार्ट फोन में अंगुलियों और अंगूठे के दम पर दुनिया को फिरंगी की तरह नचाने वाली इस पीढ़ी में अब कॉपी किताबों का प्रचलन डायनासोर की तरह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच रहा है। भारतीय भाषाओं में लेखकों या पाठकों का हमेशा रोना रहता है कि अंग्रेजी के अलावा अन्य किसी भी भाषा में पठनीय सामग्री नहीं प्रकाशित हो रही है। यही काल्पनिक बयानबाजी सिर चढ़कर बोल रही है। ऐसे में इन तमाम बयान बाजी को दरकिनार करते हुए मराठी भाषा में उपन्यास बगला ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। अभी इस उपन्यास का विमोचन भी नहीं हुआ है, लेकिन पाठकों ने इसकी सैकड़ों प्रतिलिपियों को अभी से ही आरक्षित करा लिया है। अगस्त के अंतिम सप्ताह में बगला का विमोचन होना तय हुआ है। इस उपन्यास के लेखक जाने माने रंगमंच, एंटरटेमेंट की दुनिया में हिंदी, मराठी में धारदार लेखनी के धनी प्रसाद कुमठेकर जी हैं। इस उपन्यास के प्रकाशक महेशलीला पंडित और प्रकाशन पार पब्लिकेशन है। लेखक ने सोशल मीडिया का प्रयोग करते हुए अपने उपन्यास को प्रचारित प्रसारित किया। What's app के सभी ग्रुपों और फेसबुक का भरपूर इस्तेमाल करते हुए इस उपन्यास का प्रचार प्रसार हुआ। लेखक की निजी भागेदारी की बदौलत उपन्यास ने लांच होने के पहले ही एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस उपन्यास ने ये साबित कर दिया है कि यदि लेखन में है दम है तो पाठक भी नहीं हैं कम....
तो आइये हम सब पढ़े और जाने कि आखिर बगला में है क्या ?


Monday, April 4, 2016

वेस्टइंडीज नाम का कोई देश है ही नहीं

   वेस्टइंडीज की महिला और पुरुष ने टी-20 विश्व कप जीतकर सबको हैरान कर दिया। हर किसी ने वेस्टइंडीज के इस जज्बे को सलाम किया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वेस्टइंडीज नाम का कोई देश नहीं है।
वेस्टइंडीज कैरेबियन बैसिन और नॉर्थ एटलांटिक ओशन के कुछ द्वीपों का समूह है, जो क्रिकेट खेलने के नाम पर एकजुटता दिखाते हैं। वेस्टइंडीज में बहामास द्वीप, क्यूबा, जमैका, हैती, द डमोमिनीकल रिपब्लिक, प्यूर्तो रिको, यूनाइटेड स्टेट ऑफ वर्जिन आईलैंड, द लिवार्ड आईलैंड एंड विंडवार्ड आईलैंड, गुयाना, सुरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीप शामिल हैं। ये सभी द्वीप मिलकर वेस्टइंडीज नाम के नाम से टीम बनाकर खेलते हैं। अधिकतर खिलाड़ी जमैका, गुयाना और त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीप से आते हैं।

बहामास
क्यूबा
जमैका
हैती, द डोमोमिनिकल रिपब्लिक,
फ्यूर्तो रिको
यूनाइटेड स्टेट ऑफ वर्जिन आईलैंड
द लिवार्ड आईलैंड एंड विंडवार्ड आईलैंड
गुयाना
सुरीनाम
त्रिनिदाद
टोबैगो 

Friday, March 11, 2016

मार्क्सवाद

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांत : मार्क्सवाद बीसवीं सदी में दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाली विचारधारा तो है ही, लेकिन सोवियत संघ के विघटन, चीन के धीरे-धीरे एक पूंजीवादी तानाशाही में तब्दील होते जाने, दुनिया भर के कई देशों, जैसे रोमानिया में चाउसेस्कू जैसे तानाशाहों को जन्म देने और एक शासन व्यवस्था के रूप में विरोधियों द्वारा पूरे जोर-शोर से खारिज किए जाने के बावजूद आज भी न केवल बौद्धिक अपितु राजनैतिक दुनिया में भी बहस का विषय बनी हुई है।

एक तरफ इसे एक मृत विचारधारा घोषित करने में पूंजीवादी प्रचार तंत्र अपना पूरा जोर लगा देता है तो दूसरी तरफ अपनी हालिया हार के बावजूद दुनिया भर में वाम बुद्धिजीवी तथा वामपंथी राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से वर्तमान संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने के साथ-साथ नई परिस्थितियों के अनुसार एक वामपंथी राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था को परिभाषित करने में लगे हैं।

कम्युनिज्म के स्वप्न का सबसे बड़ा पक्ष है बराबरी पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना। आज अपने प्रचंड प्रभाव के बावजूद पूंजीवाद जो एक चीज़ कभी नहीं दे सकता वह है समानता। इसके विकास के मूल में ही गैर बराबरी की अवधारणा अन्तर्निहित है। लाभ की लगातार वृद्धि के उद्देश्य से संचालित इसका कार्य व्यापार मुनाफे की एक ऐसी हवस को जन्म देता है जो एक तरफ नए-नए और उन्नत उत्पादों की भीड़ लगाता जाता है तो दूसरी तरफ उन्हें खरीदने की ताकत को लगातार कुछ हाथों में सीमित कर बाकी बहुसंख्या को उत्तरोत्तर वंचितों के खांचे में डालता चला जाता है। दुनिया के पैमाने पर अमीर-गरीब देश बनते जाते हैं, देशों के पैमाने पर अमीर-गरीब लोग। सत्ता इन्हीं प्रभावशाली वर्गों के व्यापारिक और सामाजिक हितों की रक्षा का काम करती है।

भारत में मार्क्सवादी विचारों का प्रवेश : भारत में मार्क्‍सवादी विचारों का प्रवेश बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ। हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन को लेकर मतभेद रहे हैं। वर्तमान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार उसकी स्थापना 1925 में कानपुर में हुई थी और 1964 में उससे अलग हुआ धड़ा जो अब अपने को मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी कहता है और जो वामपंथी मोर्चे का सरगना है, के अनुसार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना ताशकंद में 1920 में हुई थी और उसमें एमएन राय, एल्विन राय (उनकी पत्नी), रोजा फिंटिंगोफ मोहम्मद अली आदि शामिल थे। किंतु ऐतिहासिक तथ्य यह सुझाते हैं कि ताशकंद में गठित पार्टी में मुख्यत: वे लोग शामिल थे जो विदेशों में मार्क्‍सवाद के प्रभाव में आए और उन्होंने सोवियत संघ की छत्रछाया में वहीं एक कम्युनिस्ट पार्टी गठित कर डाली। ऐसे लोगो का भारत जैसे देश में कोई जनाधार भी नहीं था।

भारत में वामपंथी आंदोलन : वर्तमान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दावा अधिक तर्कयुक्त लगता है, क्योंकि उसके अनुसार 1925 में जिस कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया उसमें एसवी घाटे और श्रीपाद अमृत डांगे जैसे वे राजनीतिक नेता शामिल थे जिन्होंने भारत में ट्रेड यूनियनों की शुरुआत की थी। इस तरह 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म तब हुआ जब सोवियत संघ अस्तित्व में आ चुका था और रूस में 1917 की अक्टूबर क्रांति से कई बुद्धिजीवी, ट्रेड यूनियन नेता और विशेषकर युवा क्रांतिकारी लोग प्रभावित हो रहे थे। इसके साथ ही यह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का दौर भी था जब उपनिवेशवाद और विशेष कर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध अनेक देशों में जनआंदोलन शुरू हो रहे थे।

भारत में कांग्रेस के नेतृत्व में जो राष्ट्रवादी आंदोलन अपने उभार पर था और उसमें अनेक कम्युनिस्ट शामिल थे। तत्कालीन सोवियत संघ भी अनेक देशों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के पक्ष में था। भारत में कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के भीतर रहकर अपना राजनीतिक कार्य करने का निर्णय लिया, पर एक पार्टी के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना के बाद लगभग डेढ़ दशक तक भूमिगत रही, पर उसके अनेक नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर कार्य करते रहे।

भारतीय कम्युनिस्टों का दावा है कि उन्होंने ही पहली बार पूर्ण स्वराज्य की मांग उठाई थी और उन्हीं के दबाव में आकर 1927 के कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस ने इसे स्वीकार कराया था। एक ओर जहां व्यक्तिगत स्तर पर कम्युनिस्ट कांग्रेस के भीतर रहकर कार्य कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर वे ट्रेड यूनियनों के माध्यम से मजदूरों को संगठित भी कर रहे थे।

1929 में गिरणी कामगार मजदूरों के नेतृत्व में बंबई में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल, 1930 में कलकत्ता के जूट मजदूरों और रेलवे तथा बागान मजदूरों की हड़ताल और कानपुर, मदुरई और कोयंबटूर में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल के पीछे कम्युनिस्टों का ही हाथ था। उस समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन एटक में (जिससे टूटकर बाद में कांग्रेस का ट्रेड यूनियन मोर्चा इंटक बना) मुख्यत: कम्युनिस्ट ही अग्रणी पदों पर थे। 1929 में मेरठ षड्यंत्र मुकदमा सामने आया। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीय रेलवे में हड़ताल कराने के लिए तीन अंग्रेजों सहित अनेक ट्रेड यूनियन नेताओं को गिरफ्तार किया और उन पर मुकदमा चलाया। उन पर आरोप यह भी था कि वे भारत में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कार्मिटर्न) की शाखा स्थापित करने जा रहे थे।

गिरफ्तार लोगों में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एसए डांगे, मुजफ्फर अहमद आदि शामिल थे। 1929 से 1933 तक चले इस मुकदमे ने न केवल मजदूरों के बीच, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी पहचान बनाने में मदद की। आगे चलकर जब 1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण, नरेंद्र देव और मीनू मसानी के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उसमें शामिल हो गई क्योंकि कांग्रेस का यह घटक कुछ हद तक मार्क्‍सवादी विचारों की दुहाई देता था और साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को नाराज भी नहीं करना चाहता था।

भारतीय कम्युनिस्ट तब लेनिन के इस विचार से प्रेरित थे कि उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के साथ एकता और संघर्ष की नीति अपनानी चाहिए और लगातार यह प्रयास करना चाहिए कि इन आंदोलनों को एक वामपंथी दिशा प्रदान की जाए। इसका एक उदाहरण यह है कि जब कांग्रेस के त्रिपुरा सम्मेलन के बाद सुभाष चंद्र बोस द्वारा 1939 में फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना किए जाने के बाद जब वामपंथी समेकन समिति का गठन किया गया तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उसमें शामिल हुई। इसमें फारवर्ड ब्लॉक और कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और अनुशीलन दल जैसे अन्य वामपंथी संगठन भी शामिल थे। पर कुछ समय बाद ही अनुशीलन दल और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी इस सहमेल से अलग हो गए और यह सहमेल ढह गया। अनुशीलन पार्टी के नेताओं ने फिर क्रांतिकारी समाजवादी दल (आरएसपी) का गठन किया।

कम्युनिस्टों पर अंग्रेजों का साथ देने का आरोप
कम्युनिस्टों पर अंग्रेजों का साथ देने का आरोप : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लगातार सोवियत संघ से ही मार्गदर्शित होती रही। जब दूसरा महायुद्ध शुरू हुआ तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग-थलग होना पड़ा। इसकी वजह यह थी जब देश में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चल रहा था तब उसने इस आंदोलन का विरोध किया, क्योंकि सोवियत संघ, ब्रिटेन और अमेरिका हिटलर के फासीवाद से लड़ रहे थे। इसीलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि उसने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया।

इस तरह आजादी से पहले भारतीय वामपंथ पूरी तरह सोवियत संघ के मार्गनिर्देश में कार्य करता रहा। पर वैचारिक दृष्टि से वह इस दुविधा से भी ग्रस्त रहा कि उग्रवादी रणनीति अपनाए या फिर राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा के साथ चले। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से अलग होते हुए भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने न केवल अनेक औद्योगिक हड़तालों की अगुवाई की, बल्कि पश्चिम बंगाल में किसानों के अधिकारों के लिए तेभागा आंदोलन और केरल में पुनप्रा-वायलार आंदोलन भी चलाया। इन दोनों राज्यों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति पहले से ही मजबूत थी।

पर इस दौर का सबसे महत्त्वपूर्ण आंदोलन निजाम की हुकूमत के अंतर्गत आने वाले भयावह निर्धनता से ग्रस्त तेलंगाना क्षेत्र में चलाया गया किसानों का सशस्त्र आंदोलन था। इस संघर्ष में सैकड़ों कम्युनिस्टों और आंदोलनकारी किसानों की जानें गईं। पर इस आंदोलन ने सैकड़ों गांवों को भूस्वामियों के चंगुल से मुक्त कराया और कई स्थानों पर किसानों के बीच भूमि का पुनर्वितरण भी किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सशस्त्र संघर्ष की यह सबसे बड़ी कार्रवाई थी।

इस संघर्ष का एक कारण उस समय पार्टी पर हावी उग्रवादी लाइन थी जिसके चलते आजादी मिलने पर उसने ‘यह आजादी झूठी है’ और 'लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिंदुस्तान’ जैसे नारे कम्युनिस्टों की भाषा का अंग बन गए। इस लाइन को आज पार्टी वामपंथी संकीर्णतावाद की लाइन मानती है। इसके चलते पार्टी को अलगाव का सामना करना पड़ा जिसे दूर करने के लिए उसने संशोधित कार्यक्रम अपनया और संकीर्णतावादी लाइन त्याग कर आजाद भारत के पहले चुनावों में भाग लेने की तैयारी में जुट गई।


पहला चुनाव : 1951-52 के पहले लोकसभा चुनावों में पार्टी को 16 सीटें प्राप्त हुई और वह कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर रही और इस तरह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उसने संसदीय लोकतंत्र में अपनी एक पहचान बनाई। इसने 1957 के चुनावों में 27 और 1962 के चुनावों में 29 सीटें हासिल कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी बढ़ती शक्ति का परिचय दिया।

वर्ष 1957 में उसने केरल विधान सभा चुनावों में 127 सीटों में से 60 सीटों पर विजय हासिल की और पांच स्वतंत्र विधायकों की मदद से ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट मंत्रिमंडल का गठन किया।

यह जनतांत्रिक चुनावों के माध्यम से विश्व में कम्युनिस्टों की पहली जीत थी वरन साम्यवादी समानता पर आधारित समाज को ताकत के बल पर स्थापित करने का विचार रखते थे। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में गठित इस पहली राज्य स्तर की सरकार ने भूमि सुधारों को लेकर काम करना शुरू ही किया था कि 1959 कांग्रेस ने संविधान के अनुच्छेद 356 का सहारा लेकर उसे गिरा दिया। पर इससे यह स्पष्ट था कि अब तक कि कम्युनिस्ट राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा की एक शक्ति बन चुके थे।

पर इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर कथित ‘वामपंथी संकीर्णतावादियों’ और ‘संशोधनवादियों’ के बीच का टकराव भीतर ही भीतर सुगबुगा रहा था। 1962 में भारत-चीन युद्ध ने इस टकराव में चिंगारी का काम किया। पार्टी का एक धड़ा खुले आम यह कह कर चीन का पक्ष ले रहा था कि यह तो एक पूंजीवादी और एक कम्युनिस्ट देश के बीच का टकराव है। इस टकराव के फलस्वरूप 1964 में पार्टी का विभाजन हो गया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) अस्तित्व में आई। विभाजन के बाद 1967 में बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एक बड़ी शक्ति बनकर उभरी और उसने बंगला कांग्रेस के अजय मुखर्जी के नेतृत्व में गठित राज्य सरकार के गठन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। पर 1977 के बाद से बंगाल में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी लम्बे समय तक चुनावों के जरिए लगातार सत्ता में बनी रही।

वहीं 1969 में केरल में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग ने अपना समर्थन वापस ले लिया और इसके बाद वहां कांग्रेस के सहयोग से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अच्युत मेनन के नेतृत्व में राज्य सरकार का गठन किया गया। पर 1964 के विभाजन के बाद मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक धड़े ने उत्तरी पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी में किसान विद्रोह का नेतृत्व कर अपने को पार्टी से अलग कर लिया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादियों) ने इस आंदोलन का समर्थन किया, पर पश्चिम बंगाल सरकार ने जिसमें माकपा प्रमुख साझेदार थी, इस आंदोलन को कुचल दिया।

विभाजन के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ इस आधार पर तालमेल स्थापित किया कि कांग्रेस मूलत: राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की पार्टी है और क्योंकि राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग इजारेदाराना पूंजीपति वर्ग से कम घातक है, इसलिए उसके साथ तालमेल स्थापित करना भारतीय स्थितियों में उचित होगा।

मार्क्सवादियों पर चीन का असर : दूसरी ओर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ में चीनी मार्क्‍सवाद से प्रेरित रही, पर धीरे-धीरे भारतीय राजनीति के व्यावहारिक धरातल पर उतर आई। इंदिरा गांधी के शासन द्वारा थोपे गए राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान वह अन्य सभी कांग्रेस विरोधी शक्तियों के साथ शामिल हो गई जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस का पल्ला थामे रही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल थोपे जाने का समर्थन इस आधार पर किया कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में घोर दक्षिणपंथी शक्तियां देश को विभाजित करने पर आमादा थीं। इसमें संदेह नहीं कि ‘संपूर्ण क्रांति’ की आड़ में पुरानी कांग्रेस के सदस्य, लोकदल, जनसंघ और अन्य दक्षिणपंथी राजनीतिक तत्व अपना हित साधने के लिए एकजुट हुए थे, पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि कांग्रेस के भीतर भी संजय गांधी की अगुवाई में दक्षिणपंथी तत्व प्रभुत्व में आ चुके थे और कांग्रेस सर्वसत्तावादी चरित्र धारण कर चुकी थी।

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में सफाया : आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। उसके लोकसभा सदस्यों की संख्या 1971 के चुनावों में 23 से घटकर 1977 के चुनावों में मात्र सात रह गई। कुछ इस वजह से और कुछ राजनीतिक रूप से अलग-थलग हो जाने के भय से उसने कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया कि आपातकाल का समर्थन उसकी एक ऐतिहासिक भूल थी। पर पार्टी ने कांग्रेस को कभी राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की प्रतिनिधि मानने और उसके साथ वामपंथी जनतांत्रिक एकता स्थापित करने के अपने पिछले दृष्टिकोण को क्यों त्यागा इसका विचारधारात्मक स्तर पर स्पष्टीकरण अभी भी सामने नहीं आया है। 1978 के बाद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में आत्ममंथन की जो नई प्रक्रिया चली उसके फलस्वरूप वामपंथी एकता की स्थापना हुई।

भारतीय वामपंथ के एकजुट होने के साथ ही साथ भारतीय राजनीति में भी बदलाव आने लगे। कांग्रेस का पूर्ण प्रभुत्व समाप्त होने लगा और बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश और अन्यत्र क्षेत्रीय राजनीतिक दल महत्त्व धारण करने लगे और दक्षिणपंथी भाजपा पूरी तरह से राष्ट्रीय मुख्य धारा का अंग बन गई। वामपंथी एकता स्थापित होने से वामपंथी केवल संसद में एक अधिक बड़ी शक्ति बन गए और मुख्य धारा की राजनीति में हस्तक्षेप करने में और अधिक सक्षम बन गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इंद्रजीत गुप्ता केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले पहले कम्युनिस्ट रहे। एक बार तो ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश भी की गई (जो खुद उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने अस्वीकार कर दिया)। जब हरकिशनसिंह सुरजीत मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे तब वामपंथ ने ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने का प्रयास भी किया।

वामपंथी दल तीसरे विकल्प की बात करते हैं। इस दिशा में वे कई प्रयास कर चुके हैं। पर इस तीसरे विकल्प में वे जिन दलों को शामिल करने का प्रयास करते रहे हैं, उनके साथ तालमेल बनाने का औचित्व वर्ग विश्लेषण के आधार पर वे कभी भी स्पष्ट नहीं कर पाए। मसलन जातीय राजनीति करने वाली मुलायमसिंह यादव की समाजवादी पार्टी का वर्ग विश्लेषण उन्होंने कभी भी नहीं किया। उनके लिए इस दल की प्रासंगिकता केवल इसलिए है कि वह पहले कांग्रेस और फिर भाजपा के विरोध में रही थी। मार्क्‍सवादी विचारधारा को जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि भारतीय वामपंथ एक ऐसा वर्ग दृष्टिकोण अपनाए जो न केवल भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक हो, बल्कि उनके वर्गीय आधार का विस्तार भी करे।

Friday, January 29, 2016

कई देशों में फैल चुका है जीका वायरस

जिका वायरस लैटिन अमेरिका के करीब 20 देशों में फैल चुका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन को कनाडा और चिली को छोड़कर प्रत्येक अमेरिकी देश में इसके फैलने की आशंका है। डेनमार्क और स्विटजरलैंड लैटिन अमेरिका से लौट रहे लोगों में जिका संक्रमण की रिपोर्ट देने के लिए यूरोपीय देशों की बढ़ती संख्या में जुड़ गए हैं।

तो वहीं मध्य अमेरिका के सबसे छोटे और घनी आबादी वाले देश अल साल्वाडोर ने समूचे मध्य अमेरिका की महिलाओं को सलाह दी है कि वह 'जीका' वायरस के खतरे को देखते हुए वर्ष 2018 तक गर्भधारण करने की योजना ना बनाएं। डेंगू की ही तरह मच्छरों के माध्यम से फैलने वाले 'जीका' वायरस से विश्व के दर्जनों देश प्रभावित हो रहे हैं।

जाइका से लड़ाई के लिए डब्ल्यूएचओ ने कसी कमर 

गुरुवार को हुई बैठक में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक मार्गेट चेन ने कहा कि जाइका भयंकर रूप ले रहा है और तेजी से फैल रहा है।

कनाडा और चिली को छोड़कर पूरे उत्तरी और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप में इस वायरस के फैलने के खतरे को देखते हुए संगठन ने यह बैठक बुलाई थी। अमेरिकी महाद्वीपों में चालीस लाख लोगों पर इसके संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने प्रभावित देशों की यात्रा करने वाले लोगों के रक्तदान करने पर भी रोक लगाने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वायरस का संक्रमण नहीं रोका गया तो यह भयानक महामारी का रूप ले सकता है। साथ ही इबोला की तरह हजारों लोगों के मरने का अंदेशा भी जताया जा रहा है।

गौरतलब है कि जाइका वायरस से प्रभावित महिलाएं ऐसे शिशुओं को जन्म दे रही हैं जिनका मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता है। लातिन अमेरिका और कैरिबिया के 21 देशों में यह वायरस फैल चुका है। ब्राजील इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ ने लातिन अमेरिकी देशों से एकजुट होकर इस वायरस से लड़ने की अपील की है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इससे निपटने के टीकों और उपचार के विकास में तेजी की अपील की है। विशेषज्ञों के अनुसार जाइका वायरस को खत्म करने के लिए टीका तैयार करने में कम से कम दो साल का वक्त लग सकता है।

जीका वायरस के लक्षण:
जीका वायरस से संक्रमित हर पांच में से एक में ही इसके लक्षण दिखते हैं। आम तौर पर संक्रमित व्यक्तियों में जोड़ों में तेज दर्द, आंखें लाल होना, मतली, चिड़चिड़ापन या बेचैनी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

कहां से आया जीका:
जीका का पहला मामला1947 में युगांडा में मिला था। वर्ष 2015 तक यह वायरस अफ्रीका, एशिया और प्रशांत द्वीपों में भी पाया गया जो अब फैलते हुए अब 14 देशों में में जा चुका है।जीका वायरस को एडीज मच्छर फैलाता है, इसलिए मच्छर के काटने से बचना सबसे जरूरी बचाव है।

बचाव:
अब तक इस वायरस से निपटने के लिए कोई वैक्सीन या दवा नहीं बनी है। फिलहाल तो हर हाल में मच्छरों के काटने से बचना ही एकमात्र एक उपाय है।