Sunday, July 9, 2017

क्या IPC का दूसरा रूप GST है ?

       क्या IPC का दूसरा रूप GST है ?


  अदालत एक ऐसी जगह है जहां हर कोई जाने से डरता है। एक बार आप अदालत के फंदे में फंस गए तो फिर गणेश परिक्रमा करते करते शायद ज़िंदगी गुजर जाये। जीएसटी के मामले में भी कुछ ऐसा ही नज़र आ रहा है। अदालत के दांव- पेंच में माहिर अरुण जेटली की पोटली से जैसे जैसे जीएसटी लिहाफ से बाहर निकल रहा है तो इसे समझने के बाद ऐसा लगता है कि इसे आईपीसी की लाठी से हांक दिया है। अंतर इतना है कि आईपीसी की व्याख्या करने के लिए काले कोट वाले मिल जायेंगे, लोकिन जीएसटी को समझने के लिए अभी तो सीए भी नहीं समझ पा रहे। तो फिर क्या जीएसटी भी आईपीसी की तर्ज पर नुकीले पेंच से फंसा हुआ है ?  जिस आईपीसी को जज और वकील अपने अनुसार उसको निचोड़ कर फैसला सुनाते हैं, कुछ ऐसा ही जीएसटी को निचोड़ने पर एक देश एक टैक्स के बजाय एक देश में अनगिनत टैक्स धरातल पर उतर रहे हैं। यानी कि 13 साल की घनघोर तपस्या के बाद जीएसटी का जो खाका मोदी सरकार ने खींचा है वो किसी इंडियन पीनल कोड की धारा से कम नहीं है। तो फिर क्या जीएसटी को समझने के लिए आईपीसी पढ़ना जरूरी है। क्योंकि प्रथम दृष्ट्या तो यही मालूम पड़ रहा है कि जीएसटी के निर्माता आईपीसी के माहिर खिलाड़ी है। ऐसे में अगर जीएसटी भी आईपीसी की छौंक-बघार से बना है तो फिर यह केवल चुनिंदा लोगों के हाथ में रह जायेगा। जीएसटी अन्य देशों की अपेक्षा भारत का जीएसटी किसी जलेबी से कम नहीं है। जिन देशों से जीएसटी की परिभाषा उधार ली गई है, इतना उलझा हुआ तो उन देशों ने भी नहीं बनाया तो फिर सवाल ये उठता है कि भारत के नौकरशाहों ने सफेदपोश के चक्कर में फंसकर घुंघराला जीएसटी किस आधार पर पैदा कर दिया। जिन देशों में जीएसटी लागू है, उनमें रूस में सबसे अधिक 18 फीसदी फिर चीन में 17 फीसदी है।  मैक्सिको में 16 फीसदी, न्यूजीलैंड, मॉरिसस और कनाड़ा में 15 फीसदी,  दक्षिण अफ्रीका में 14 फिलीपींस में 12 फीसदी है। जबकि सिंगापुर जहां से जीएसटी को उधार लिया गया है वहां सात फीसदी है। वहीं कुवैत, यूएई, बहरीन, में सबसे कम 5 फीसदी है।   

      तो फिर अब सवाल यह उठता है कि आखिर किस वर्ग को खुश करने के लिए इतना घुमावदार जीएसटी बनाया गया है? इस लच्छेदार जीएसटी से एक बात तो तय है कि छोटे और मझोले व्यापारियों के लिए व्यापार करना अब आसान नहीं रह जायेगा। जीएसटी का स्लैब भी किसी गगनचुंबी इमारत की स्लैब से कम नहीं है। जीएसटी का स्लैब ज़ीरो फीसदी, 3, 5, 12, 18 और 28 फीसदी का है। इस स्लैब के अलावा भूल चूक लेन-देन भी माफ नहीं है। यानी सावधानी हटी, कारावास की दीवार से कब सट गए पता ही नहीं चलेगा। छोटे स्तर के व्यापारी और मझोले किस्म के उद्योग धंधों पर खतरों के बादल मंडराने लगे हैं। आम व्यापारी जब तक इस मकजड़जाल को समझेगा। तब तक उद्योग जगत को बहुत हानि हो चुकी होगी। जीरो फीसदी नाम का एक अलग से स्लैब तैयार किया गया है। यही ज़ीरो फीसदी 2019 के बाद काल के गाल में जाने के लिए तैयार करेगा। दरअसल रोजमर्रा की चीजों को जीरो फीसदी टैक्स पर रखा गया है, यानी कि अभी तो उसमें टैक्स नहीं लगेगा, लेकिन भविष्य में चुपके से कब जीरो से कुछ पर्सेंट बढ़ा दिया जायेगा, ये किसी को भी पता नहीं चलेगा। यहां एक देश एक टैक्स के नाम पर कई तरह के टैक्स, सेस लगाए गए हैं, जिसमें व्यापारी वर्ग को हर प्रदेश के अनुसार रिटर्न फाइल करना होगा। छोटे और मझोले व्यापारी स्थाई रूप से सीए या एकाउंटेंट नहीं रखते, लेकिन अब उन्हें इन दोनों पदों पर हमेशा के लिए नियुक्त करना पड़ेगा। तो फिर क्या मोदी सरकार ने जो करोड़ों जॉब देने का वादा किया था, वो जीएसटी के जरिए पूरा किया जायेगा। यदि जीएसटी के जरिए रोजगार की खोज की जा रही हो, तो फिर सवाल ये उठता है कि कितने व्यापारी बचेंगे जो जीएसटी को देने लायक बचेंगे। ऐसे में यदि जीएसटी ही व्यापारी वर्ग को तबाह करने का औजार बन रहा हो तो फिर मोदी सरकार का कहना है कि उसके रगों में व्यापारी का खून बहता है, तो फिर यह कौन सा खून है जिससे व्यापारी सहमें हुए हैं। क्या विश्व व्यापार संगठन के आंतरिक दबाव की वजह से इतना पेचीदा जीएसटी बनाया गया है या फिर नौकरशाह ही खुद न समझ पा रहे हों कि जीएसटी की स्लैब की इमारत कैसे खड़ी की जाती है ?  अभी जीएसटी के सिस्टम को समझने के लिए बैंकिग सेक्टर पूरी तरीके से तैयार नहीं है। इस नए जीएसटी से बैंकिंग सेक्टर के ऊपर जो दबाव बढ़ेगा, वो अलग है। कुल मिलाकर जीएसटी को जितना जलेबी की तरह मीठा बताया जा रहा है, वैसा है नहीं, बल्कि टेढ़ा जरूर है। यह जीएसटी किसी आईपीसी की धारा से कम नहीं है। यानी भारतीय दंड संविदा और वस्तु एवं सेवा दर क्या एक समान हो गए। भारतीय दंड संविदा को तो सभी जानते है, लेकिन नतीजे क्या होगें ये किसी को पता नहीं रहता। तो फिर नतीजों का इस्तेमाल करने लिए क्या जीएसटी ही दूसरा आईपीसी बनकर साबित होगा। 

1 comment:

Maria Reese said...

देश में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की विविधता में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. मौसम का अभी संक्रमण काल चल रहा है यह कब तक नियत हो जायेगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. पर मौसम की विविधता का कृषि कार्यों और फलस्वरूप उत्पादन से काफी गहरा रिश्ता है. यह रिश्ता भारत में उगाई जाने वाली फसलों पर कुछ ज्यादा ही दिखता है.

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